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गणेश चतुर्थी

गणेश चतुर्थी मनाने के दौरान लोग भगवान गणेश की पूजा अर्चना करते है। गणेश हिन्दू धर्म में सबसे प्रसिद्ध देवता है जो परिवार के सभी सदस्यों के द्वारा पूजे जाते है। किसी भी क्षेत्र में अगर कोई भी नये कार्य की शुरुआत से पहले भगवान गणेश जी लोगों द्वारा हमेशा पूजे जाते है। ये त्यौहार खासतौर से महाराष्ट्रा में मनाया जाता है हालाँकि अब ये भारत के सभी राज्यों में मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी हिन्दूओं का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। लोग गणेश चतुर्थी पर पूरी भक्ति और श्रद्धा, ज्ञान और समृद्धि के भगवान की पूजा अर्चना करते है।

लोग ऐसा भरोसा करते है कि भगवान् श्री गणेश जी हर साल ढ़ेर सारी खुशी और समृद्धि के साथ आते है और जाते वक्त सभी दुखों को हर लेते हैं। इस पर्व पर गणेश जी को खुश करने लिये भक्त अनेक प्रकार की तैयारियाँ करते है। उनके सम्मान और स्वागत के लिये गणेश जी के जन्म दिवस के रुप में इस त्यौहार को मनाया जाता है। ये उत्सव भाद्रपद के महीने में शुक्ल पक्ष में चतुर्थी पर आरंभ होता है और 11वें दिन अनन्त चतुर्दशी पर खत्म होता है। हिन्दू धर्म में गणेश की पूजा बहुत ज्यादा मायने रखती है और ऐसा माना जाता है कि जो कोई पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ उनकी पूजा करेगा उसे वो धन, खुशी, ज्ञान, तथा लंबी आयु प्रदान करेंगे।

गणेश चतुर्थी के दिन लोग जल्दी ही स्नान कर लेते है, साफ कपड़े पहन कर भगवान गणेश की पूजा करते है। वो मंत्रोच्चारण, आरती गाकर, हिन्दू धर्म के दूसरे रिती-रिवाज निभाकर, भक्ति गीत गाकर प्रार्थना करते है। पहले ये त्यौहार कुछ परिवारों में ही मनाया जाता था। बाद में ये बड़े त्यौहार के रुप में मनाया जाने लगा बाद में इसको बड़ा बनाने के लिये इसमें मूर्ति स्थापना की जाने लगी और पूजा खत्म होंने के बाद विसर्जन शामिल किया गया साथ ही इससे कष्टों से भी मुक्ति मिलने लगी। 1983 में इसे लोकमान्य तिलक जो की सामाजिक कार्यकर्ता, भारतीय राष्ट्रवादी तथा स्वतंत्रता सेनानी के द्वारा इस त्यौहार की शुरुआत हुई। उस समय अंग्रेजी शासन से भारतीयों को बचाने के लिये एक गणेश पूजा की प्रथा बनायी गयी थी।

अब के दिनों में गैर ब्राह्मण और ब्राह्मण के बीच के फर्क को हटाने के लिये एक राष्ट्रीय पर्व के रुप में गणेश चतुर्थी मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी को और भी कई नामों से जाना जाता है इसमें से कुछ – एकदन्ता, शक्तियों के भगवान, हेरांबा, असीम,, लंबोदरा, विनायक, भगवानों के भगवान, बुद्धि, समृद्धि और संपत्ति के भगवान आदि। भगवान् श्री गणेश विसर्जन की पूर्णं हिन्दू प्रथा के साथ 11वें दिन पर लोग भगवान् गणेश को विदा करते है। वो भगवान से प्रार्थना करते है कि वो अगले वर्ष फिर से उनके पधारें और सभी को अपना आशीर्वाद दें।

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रक्षाबंधन

हम सब सामाजिक प्राणी है, जो कि एक-दूसरे से जुड़े रहने के लिए स्वेच्छा से रिश्तों के बंधन में बंधते है। ये बंधन हमारी स्वतंत्रता का खत्म करने वाले बंधन नहीं बल्कि प्रेम के बंधन होते हैं, जिसे हम जिंदादिली से जीते और स्वीकारते हैं।

हमारे धर्म में हर रिश्ते को कोई न कोई नाम दिया गया है। ठीक उसी तरह एक आदमी और औरत के भी कई रिश्ते हो सकते हैं, मगर उन रिश्तों में सबसे प्यार रिश्ता ‘भाई-बहन’ का होता है। यह रिश्ता हर रिश्ते से मीठा और सबसे प्यारा रिश्ता होता है और इस रिश्ते में मिठास भरता है भाई-बहन का एक-दूसरे के प्रति प्रेम और विश्वास।

यह विश्वास प्रतीक रूप में भले ही रेशम की कच्ची डोर से बँधा होता है लेकिन दोनों के मन की भावनाएँ प्रेम की एक पक्की डोर से हमेशा के लिए बँधी रहती है, जो रिश्तों की हर डोर से ज्यादा मजबूत डोर होती है। यही प्रेम रक्षाबंधन के दिन भाई को अपनी प्यारी बहन के पास खीच लाता है।

रक्षाबंधन केवल एक त्योहार ही नहीं बल्कि हमारी परंपराओं का प्रतीक है, जो आज भी हमें अपने परिवार व संस्कारों से जोड़े रखे हैं। रक्षाबंधन के दिन भाई अपनी बहन की सदैव रक्षा करने का वचन देता है, जिसमें भाई हर संकट में अपनी बहन का साथ निभाने का वादा करता है। यही वह वचन है, जो आज के युग में भी भाई-बहन को विश्वास के बँधन से जोड़े हुए है।

इस त्यौहार को बहन अपने अपने मायके में मनाती है। तभी तो हर रक्षाबंधन पर बहन बेसब्री से अपने भाई के आने का इंतजार करती है उतनी ही ख़ुशी से भाई भी अपनी बहन से मिलकर उसका हालचाल जानने को अपने बहन के पास ‍खिंचा चला आता है और भाई और बहन का मिलन होता है, तब सभी गिले-शिकवे दूर होकर और उस माहौल में बस हँसी-ठिठौली के स्वर ही गूंजते हैं, जो खुशियों का पर्याय होते हैं।

आप भी इस त्योहार को प्यार के साथ मनाये और इस दिन अपनी बहन को उसकी खुशियाँ उपहारस्वरूप दें। याद रखें यह रिश्ता, जितना मजबूत और प्यारा रिश्ता है और उतना ही कमजोर भी1 इसलिए रिश्ते की इस डोर को सदैव मजबूती से थामे रखें और अपनी बहन को हमेशा खुश रखे।

 

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दशहरा

दशहरा भारत का एक महत्वपूर्ण और लंबा त्यौहार है। पूरे देश में इसे पूरे उत्साह, प्यार, विश्वास के साथ हिन्दू धर्म के लोगों द्वारा मनाया जाता है। सभी के लोगों द्वारा मस्ती करने के लिये ये बहुत अच्छा समय होता है। दशहरा के उत्सव पर स्कूल और कॉलेजों में भी कुछ दिनों की छुट्टी होती है। दशहरा हर साल सितंबर और अक्टूबर के महीने में दिवाली के ठीक 20 दिन पहले पड़ता है। लोगों को इस त्योंहार का सभी बड़ी बेसब्री से इंतजार रहता है।

हिंदुस्तान एक ऐसा देश है जो अपनी परंपरा और संस्कृति, मेले और पर्व के लिये जाना जाता है। यहाँ हर त्यौहार को लोग पूरे जोश और खुशी के साथ मनाते है। हिन्दू त्यौहार को महत्व देने के साथ ही इस त्योंहार को पूरे जोश और  खुशी के साथ मनाने के लिये भारत की सरकार द्वारा दशहरा के इस उत्सव पर सरकारी अवकाश की घोषणा की जाती है।

दशहरा का अर्थ है ‘बुराई पर अच्छाई की जीत’। इस त्यौहार का वास्तविक अर्थ 10 सर वाले असुर का इस त्यौहार के दसवें दिन पर अंत है। पूरे भारत देश में सभी लोगों के द्वारा रावण को जलाने के साथ ही इस त्यौहार का दसवाँ दिन मनाया जाता है।

देश के कई क्षेत्रों में लोगों के रीति-रिवाज और परंपरा के अनुसार इस त्यौहार को लेकर बहुत सारी कहानियाँ है। इस पर्व की शुरुआत हिन्दू लोगों के द्वारा उस दिन से हुई जब भगवान श्री राम ने रावण को दशहरा के दिन मार दिया था। भगवान राम ने रावण को इसलिये मारा क्योंकि उसने भगवान् श्री राम जी की सीता का हरण कर लिया था। इसके बाद भगवान श्री राम ने हनुमान की वानर सेना और लक्ष्मण के साथ मिलकर रावण को परास्त और उसका वध किया।

हिन्दू धर्मग्रंथ रामायण के अनुसार, कहा जाता है कि देवी दुर्गा को खुश करने और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिये राजा राम ने चंडी होम कराया था और इसके अनुसार युद्ध के ठीक दसवें दिन लंका नरेश रावण को मारने का राज जान कर उस पर विजय प्राप्त कर ली थी। अंतत: रावण को मारने के बाद राम ने सीता को वापस पाया। इसलिए दशहरा को दुर्गोत्सव भी कहा जाता है क्योंकि उसी दसवें दिन दुर्गा माता ने भी महिषासुर नामक असुर का वध किया था। हर क्षेत्र के रामलीला मैदान में एक बहुत बड़ा मेला आयोजित किया जाता है जहाँ दूसरे क्षेत्रो के लोग इस मेले के साथ रामलीला का नाटकीय मंचन देखने आते है।

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दीपावली

दीपावली को रोशनी का त्योहार के रुप में जाना जाता है जो भरोसा और उन्नति लेकर आता है। हिन्दू, सिक्ख और जैन धर्म के लोगों के लिये इसके कई सारे प्रभाव और महत्ता है। ये 5 दिनों का त्यौहार है जो हर साल दशहरा के  इक्कीस दिनों बाद आता है। इसके पीछे कई सारी सांस्कृतिक आस्था है जो भगवान राम के चौदह  वर्ष के वनवास के बाद अपने राज्य के आगमन पर मनाया जाता है। इस दिन भगवान राम के अयोध्या में वापिस आने पर अयोध्यावासियो ने आतिशबाजी और रोशनी से उनका स्वागत किया।

दीपवाली के समय लोग अपने घर और कार्य स्थलों की साफ-सफाई और रंगाई-पुताई करते है। ऐसी मान्यता है कि हर तरफ रोशनी और खुले खिड़की दरवाजों से देवी लक्ष्मी उनके लिये बहुत सारा आशीर्वाद, सुख, संपत्ति और यश लेकर आएंगी। इस पर्व में लोग अपने घरों को सजाने के साथ रंगोली से अपने मेहमानों का स्वागत करते है। नये कपड़ों, खुशबुदार पकवानों, मिठाईयों और पटाखों से 5 दिन का ये त्यौहार और चमकदार हो जाता है।

दीपवाली के पहले दिन को धनतेरस या धनत्रेयोंदशीं कहा जाता है जिसे माता लक्ष्मी की पूजा के साथ मनाया जाता है। इसमें लोग देवी को खुश प्रसन्न के लिये भक्ति गीत, आरती और मंत्र का उच्चारण करते है। दूसरे दिन को नारक चतुर्दशी या फिर छोटी दिपावली कहते है जिसमें भगवान श्री कृष्ण की पूजा की जाती है क्योंकि इसी दिन भगवान् कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था। ऐसी धार्मिक धारणा है कि सुबह जल्दी तेल से स्नान कर माता काली की पूजा करते है और उन्हें कुमकुम लगाया जाता है।

तीसरा दिन मुख्य दीपावली का होता है जिसमें माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है, अपने मित्रों और परिवारजन में मिठाई और उपहार दिए जाते है साथ ही शाम को सब मिलकर जमके आतिशबाजी की जाती है।

चौथा दिन गोवर्धन पूजा के लिये होता है जिसमें भगवान श्री कृष्ण की पूजा की जाती है। लोग गाय के गोबर से अपनी दहलीज पर गोवर्धन बनाकर पूजा करते है। कहा जाता है कि भगवान कृष्ण जी ने अपनी सबसे छोटी उँगली पर गोवर्धन पर्वत को उठाकर अचानक आयी वर्षा से गोकुल के लोगों को बारिश के देवता इन्द्र से बचाया था। पाँचवें दिन को हमलोग यामा द्वीतिय या भैया दूज के नाम से जानते है। रक्षाबंधन भाई-बहनों का त्योहार होता है।

 

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